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Bankim Chandra Chattopadhyay
वंदे मातरम् @150 – भारत माता को नमन

भारत माता को नमन – "वंदे मातरम्"

"वंदे मातरम्" — यह केवल एक गीत नहीं, यह भारत माँ को समर्पित हमारी सच्ची श्रद्धांजली है!

साल 2025 भारत के लिए एक गौरवशाली वर्ष है — क्योंकि हम मना रहे हैं “वंदे मातरम्” गीत के 150 वर्ष।

जब आप "वंदे मातरम्" कहते हैं, तो वह सिर्फ दो शब्द नहीं होते — वह भावना होती है, एक गर्जना होती है जो हमें हमारी मातृभूमि से जोड़ती है।

“वंदे मातरम्” का ऐतिहासिक सफर

1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे अपनी प्रसिद्ध काव्य-उपन्यास "आनंदमठ" में लिखा था। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के अधिवेशन में इसका पहला गायन किया। स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत एक क्रांति का नारा बना — “वंदे मातरम्” कहते हुए हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया। 1950 में, भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया।

यह केवल एक गीत नहीं था, बल्कि राष्ट्र-चेतना का मंत्र, एकता का प्रतीक, और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का स्वर था।

🇮🇳 “वंदे मातरम् @150 — राष्ट्रगान नहीं, राष्ट्र की आत्मा है!”

वंदे मातरम्” – केवल गीत नहीं, एक भाव है

वंदे मातरम्” गीत में भारत माता को देवी के रूप में चित्रित किया गया है — जो अपने बच्चों को समृद्धि, शक्ति और करुणा प्रदान करती हैं। इस गीत ने महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे अनेक नेताओं को प्रेरणा दी। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के समय हर भारतीय के दिल की धड़कन था।

“वंदे मातरम्” के स्वर में हमें वही ऊर्जा, वही स्पंदन सुनाई देता है जो ॐकार में निहित है — दोनों ही एकत्व, श्रद्धा और सार्वभौमिक प्रेम का संदेश देते हैं।

सुजलाम् सुफलाम् – भारत की धरती का गुणगान

“सुजलाम् सुफलाम्” — भारत की शस्य-श्यामला धरती, उसकी नदियाँ, खेत, पर्वत, और उसका शांत सौंदर्य। यह गीत भारत माता की वंदना है — शक्ति, समृद्धि और संस्कृती का प्रतीक।

एक योग और नॅचरोपॅथी के छात्र के रूप में यह उत्सव केवल इतिहास की याद नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है — हम अपने सेवा के माध्यम से मातृभूमि की सेवा कैसे कर सकते हैं?

वंदे मातरम्” हमें सिखाता है –

  • मातृभूमि के प्रति सेवा का भाव,
  • अपने कर्म में समर्पण और अनुशासन,
  • और जीवन में संतुलन और समरसता।

योग और नॅचरोपॅथी – स्वस्थ राष्ट्र की नींव

योग और नॅचरोपॅथी का उद्देश्य भी यही है — स्वास्थ्य, जागरूकता और सामूहिक कल्याण। क्योंकि स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है।

हमारा संकल्प – सेवा ही राष्ट्रभक्ति है

आइए, इस अवसर पर हम एक संकल्प लें –

  • हम अपने ज्ञान से समाज को स्वस्थ, जागरूक और सशक्त बनाएँगे।
  • योग और नॅचरोपॅथी के माध्यम से भारत के प्राचीन ज्ञान को आगे बढ़ाएँगे।
  • और “वंदे मातरम्” की भावना को अपने हर कर्म में जियेंगे।

हमारा “वंदे मातरम्” केवल मुख से उच्चारित शब्द नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आचरण बनना चाहिए।

आइए, इस उत्सव का हिस्सा बनें!

आइए, “वंदे मातरम्” के 150 वर्ष को केवल उत्सव नहीं, इस दिव्य गीत के 150 वर्षों को राष्ट्र सेवा के नए संकल्प में बदलें।

🇮🇳 जय हिन्द! जय भारत! 🇮🇳
🇮🇳 वंदे मातरम्! 🇮🇳